दुष्यंत कुमार

Summary for दुष्यंत कुमार Class 11 Hindi Aroh

CBSE NCERT Revision Notes

1

पाठ परिचय 

Answer

दुष्यंत कुमार द्वारा रचित ‘साये में धूप‘ गजल संग्रह से यह गजल ली गई है। गजल एक ऐसी विधा है जिसमें सभी शेर स्वयं में पूर्ण तथा स्वतंत्र होते हैं। उन्हें किसी क्रम-व्यवस्था के तहत पढ़े जाने की दरकार नहीं रहती। इस गजल में पहले शेर की दोनों पंक्तियों का तुक मिलता है और उसके बाद सभी शेरों की दूसरी पंक्ति में उस तुक का निर्वाह होता है। इस गजल में राजनीति और समाज में जो कुछ चल रहा है, उसे खारिज करने और विकल्प की तलाश को मान्यता देने का भाव प्रमुख बिंदु है।

कवि राजनीतिज्ञों के झूठे वायदों पर व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि वे हर घर में चिराग उपलब्ध कराने का वायदा करते हैं, पंरतु यहाँ तो पूरे शहर में भी एक चिराग नहीं है। हमें ही सहारा देनेवाले दुखों का कारण बन गए हैं इसलिए यहाँ रहना भी कठिन हो गया है। वह उन लोगों के जिंदगी के सफर को आसान बताते हैं जो परिस्थिति के अनुसार स्वयं को बदल लेते हैं। मनुष्य को खुदा न मिले तो कोई बात नहीं, उसे अपना सपना नहीं छोड़ना चाहिए। भले ही हमारी आवाज़ पत्थर को नहीं पिघला सकती पर इसका प्रभाव इनसान पर तो जरूर होता ही है। शासक शायर की आवाज को दबाने की कोशिश
करता है, क्योंकि वह उसकी सत्ता को चुनौती देता है।

2

कवि परिचय

Answer

दुष्यंत कुमार का जन्म सन 1933 ई० में बिजनौर जिले में राजापुर-नबादा नामक गाँव में हुआ था। प्रयाग विश्वविद्यालय से एम० ए० की परीक्षा पास की। आकाशवाणी तथा भाषा – विभाग से लेकर आदिम-जाति विभाग तक में उन्होंने कार्य किया। अपने जीवन के अंतिम दिनों में वे भाषा – विभाग, भोपाल में सह-निर्देशक के पद पर कार्य कर रहे थे। उनका सन 1975 ई० में हृदय की गति रुक जाने से देहांत हो गया।

प्रमुख रचनाएँ: सूर्य का स्वागत, आवाज़ों के घेरे, साये में धूप, जलते हुए वन का वसंत (काव्य); एक कंठ विषपायी (गीति – नाट्य); छोटे-छोटे सवाल, आँगन में एक वृक्ष और दोहरी जिंदगी (उपन्यास)।

3

कहाँ तो तय था चिरागाँ हरेक घर के लिए,
कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए।

Answer

सारांश 
कवि राजनैतिक अव्यवस्था के बारे में व्यंग्य करता हुआ कहता है कि देश आज़ाद होने के बाद राजनेताओं द्वारा यह भरोसा दिलाया गया था कि हर घर को रोशनी देने के लिए सुख-सुविधा रूपी चिराग निश्चित रूप से प्रदान किए जाएंगे। परंतु आज तो स्थिति यह बन गई है कि घर तो क्या पूरे शहर को रोशनी देने के लिए एक चिराग़ भी उपलब्ध नहीं है। कवि कहना चाहता है कि नेताओं के बाद केवल कोरे आश्वासन ही सिद्ध हुए।

4

यहाँ दरखतों के साय में धूप लगती है,
चलो यहाँ से चल और उम्र भर के लिए।

Answer

सारांश 
कवि वर्णन कर रहे हैं कि वृक्षों को इसलिए लगाया गया था कि धूप न लगे। परंतु आज उन्हीं वृक्षों की छाया में धूप लगने लगी है। कवि ने यहाँ राजनैतिक अव्यवस्था के विषय में कटाक्ष किया है कि जनता को अनेक प्रकार की सुख-सुविधाएँ देने के लिए संस्थाएँ बनाई गई थीं परंतु वही संस्थाएँ आज जनता के लिए दुख का कारण बन गई हैं। चारों तरफ भ्रष्टाचार फैला हुआ है। कवि इन सभी व्यवस्थाओं से दूर रहकर अपना जीवन बिताना चाहता है।

5

न हो कमीज़ तो पाँवों से पेट ढक लगे,
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए।

Answer

सारांश 
कवि कहते हैं कि लोगों को यदि उपयुक्त सुविधाएँ नहीं मिलतीं तो वे विरोध किए बिना अभावों में जीना सीख लेते हैं। इनके पास वस्त्र भी न हों तो ये पैरों को मोड़कर अपने पेट को ढँक लेंगे। ऐसे लोग ही शासकों के लिए उपयुक्त हैं, क्योंकि इनके कारण उनका राज शांति से चलता है। अव्यवस्था का साम्राज्य तभी चल सकता है जब कोई उसके विरुद्ध आवाज़ न उठाए।

6

खुदा नहीं, न सही, आदमी का ख्वाब सही,
कोई हसीन नजारा तो हैं नजर के लिए।

Answer

सारांश 
कवि कहते हैं कि आज चारों ओर प्रतिकूल परिस्थितियाँ दिखाई देती हैं जिनसे मानव में निराशा व्याप्त हो रही है। निराश मानव के लिए तो एक आशा की किरण ही काफ़ी होती है। ईश्वर मानव की कल्पना तो है ही। यह अपने आप में एक ऐसा सुखद एहसास है जो जीवन जीने के लिए आशा प्रदान करता है कि एक दिन परिस्थितियाँ अपने आप सुधर जाएँगी।

7

वे मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता,
मैं बकरार हूँ आवाज में असर के लिए।

Answer

सारांश 
कवि कहते हैं कि राजनैतिक और सामाजिक क्षेत्र में फैली भ्रष्टाचार और बेईमानी के साथ रह-रहकर जनता अब इनकी अभ्यस्त हो गई है। उन्हें विश्वास हो चला है कि ये समस्याएँ अब समाप्त नहीं होंगी। जिस प्रकार पत्थर का पिघलना संभव नहीं है उसी प्रकार अब परिस्थितियों का बदलना भी संभव नहीं है। परन्तु कवि बैचैन है कि इन आम आदमियों के स्वर में क्रांति की चिंगारी आए। जनता पर अत्याचार करने वालों के विरोध में जनता को आवाज़ अवश्य उठानी चाहिए तभी परिवर्तन हो सकेगा।

8

तेरा निजाम है सिल दे जुबान शायर की,
ये एहतियात जरूरी हैं इस बहर के लिए।

Answer

सारांश 
शायर राजनैतिक-सामाजिक अव्यवस्था को देखते हुए जनता की ओर से आवाज़ उठाते हैं। इससे सत्ता को क्रांति का खतरा लगता है इसलिए वे कह उठते हैं कि तेरा राज्य है तू चाहे तो शायर की आवाज़ को दबा सकता है। जैसे गज़ल के छंद के लिए बंधन की सावधानी ज़रूरी है वैसे शासक भी अपने राज्य को कायम रखने के लिए आवाज़ को दबाने की सावधानी रखने का तरीका अपनाएगा।

9

जिएँ तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले,
मरें तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिए।

Answer

सारांश 
कवि कहते हैं कि हम जब तक जिएँ अपने ही घर, अपने ही देश रूपी बगीचे में गुलमोहर रूपी बुजुर्गों और वृक्षों की छाया में ही जीवन बिताएँ। जब मृत्यु हो तो दूसरों की गलियों में गुलमोहर के लिए मरें। दूसरे शब्दों में, मनुष्य जब तक जिएँ, वह मानवीय मूल्यों को मानते हुए शांति से जिएँ। हम दूसरों के अधिकार रूपी गुलमोहर की रक्षा के लिए गलियों में मरें।