Summary for कबीर Class 11 Hindi Aroh
CBSE NCERT Revision Notes1
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दोनों पदों के लेखक संत-कवि कबीर दास हैं, जो हिंदी कविता के निर्गुण ज्ञान-विषयक शाखा से संबंधित हैं। पहले छंद में, कबीर दास एक ज्योतिस्वरूप के रूप में ईश्वर की मौजूदगी को स्वीकार करते हैं। वह मानते हैं कि ईश्वर की मौजूदगी सृष्टि के हर कण में निहित है। हर जीवित जीव में एक ही रूप मौजूद है। जैसे पवन, पानी एक है, एक ही मिट्टी सभी बरतनों का निर्माण करती है। वैसे ही सभी जीव जंतुओं में एक ही ईश्वर का अस्तित्व मौजूद है। मनुष्य अहंकार से ग्रसित हो जाता है और भ्रम में खो जाता है। कबीर ने परमात्मा की सच्ची प्रकृति को पहचाना है, इसलिए उसके मन में अब कोई भय नहीं है।
कबीरदास जी ने दूसरे पद में हिंदू और मुस्लिम समुदायों में फैले बाहरी आडंबरों पर टिप्पणी की है। कबीर की दृष्टि में संसार बावला हो गया है जो सत्य को नहीं मानता, बल्कि झूठी बातों में विश्वास करता है। नियम और धर्मों के पालन करने वाले लोग आत्मतत्व ज्ञान को अनदेखा करके पत्थरों की पूजा करते रहते हैं। यहाँ सत्य बोलने वाले के विरोध तथा झूठ पर विश्वास किया जाता है। हिंदू और मुस्लिम धर्म के नाम पर लड़ रहे हैं, जबकि दोनों ही ईश्वर के मर्म को नहीं जानते।
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कबीर दास का जन्म 1399 ई० में वाराणसी में तथा निधन 1495 ई० में मगहर में हुआ था। नीरू और नीमा नामक जुलाहा दंपति ने उनका पालन-पोषण किया। कबीर के गुरु का नाम रामानंद था।प्रमुख रचनाएँ: ‘बीजक’ जिसमें साखी, सबद एवं रमैनी संकलित हैं।
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दोइ कहैं तिनहीं कौं दोजग जिन नाहिंन पहिचांनां।
एकै पवन एक ही पानीं एकै जोति समांनां।
सब घटि अंतरि तूही व्यापक धरै सरूपै सोई।
माया देखि के जगत लुभांनां कह रे नर गरबांनां।
निरभै भया कछू नहि ब्यापै कहैं कबीर दिवांनां।
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सारांशशब्दार्थ: दोजग – नरक, नाहिंन-नहीं, समाना – व्याप्त, खाक – मिट्टी, भांड़े – बर्तन, कोहरा – कुम्हार, सांनां – एक साथ मिलकर, बाढ़ी – बढ़ई, काष्ट – लकड़ी, अगिनि – आग, सरूपै – स्वरूप, सोई – वही, गरबानां – गर्व करना, निरभै – निडर, भया – हुआ, दिवानां – बैरागी।
कबीर दास कहते हैं कि हमें सिर्फ एक रूप के परमात्मा का ज्ञान ही है। ईश्वर की केवल एक ही सत्ता है। जो लोग एक ही परमात्मा की शक्ति को स्वीकार नहीं करते और उन्हें दो रूपों का मानते हैं, वे नरक को प्राप्त होंगे क्योंकि उन्होंने परमात्मा के स्वरूप को ही नहीं पहचाना है।
एक ही हवा बहती है, एक ही पानी बहता है, और सभी जीव एक ही ज्योति में एकाकार हो जाते हैं। जैसे कि कुम्हार सभी बर्तन एक ही प्रकार की मिट्टी से बनाता है, वैसे ही ईश्वर रूपी कुम्हार ने ही जीवों रूपी बरतनों को पंचतत्व रूपी मिट्टी से गढ़ा है। जिस प्रकार बढ़ई लकड़ी को तो काट सकता है परंतु अग्नि को कोई नहीं काट सकता, ठीक इसी प्रकार प्रत्येक कण के भीतर उसी ईश्वर का स्वरूप विद्यमान है।
माया की भ्रान्ति को देखकर दुनिया लोभ में फंस जाती है। हे मनुष्य! तुम माया के चक्र में फंसे होते हुए भी क्यों अभिमान दिखाते हो? कबीर दास कहते हैं कि दीवानों की भाँति अब उनके हृदय में कोई डर नहीं है। वे निडर रहते हुए ईश्वर की मौजूदगी को स्वीकार करते हैं।
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संतो देखत जग बौराना।
साँच कहीं तो मारन धार्वे, झूठे जग पतियाना।
नमी देखा धरमी देखा, प्राप्त करें असनाना।
आतम मारि पखानहि पूजें, उनमें कछु नहि ज्ञाना।
बहुतक देखा पीर औलिया, पढ़े कितब कुराना।
कै मुरीद तदबीर बतार्वे, उनमें उहैं जो ज्ञाना।
आसन मारि डिभ धरि बैठे, मन में बहुत गुमाना।
पीपर पाथर पूजन लागे, तीरथ गर्व भुलाना।
टोपी पहिरे माला पहिरे, छाप तिलक अनुमाना।
साखी सब्दहि गावत भूले, आतम खबरि न जाना।
हिन्दू कहैं मोहि राम पियारा, तुर्क कहैं रहिमाना।
आपस में दोउ लरि लरि मूए, मम न काहू जाना।
घर घर मन्तर देत फिरत हैं, महिमा के अभिमाना।
गुरु के सहित सिख्य सब बूड़े, अत काल पछिताना।
कहैं कबीर सुनो हो सती, ई सब भम भुलाना।
केतिक कहीं कहा नहि माने, सहजै सहज समाना।
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शब्दार्थ: पतियाना – विश्वास करना, नेमी – नियमों का पालन करने वाला, असनाना – स्नान करना, आतम – स्वयं, पखानहि – पत्थरों की मूर्तियों को, पीर औलिया – धर्म गुरु और संत ज्ञानी, तदबीर – उपाय, डिंभ धरि – घमंड करके, साखी – दोहा, सब्दहि – पद, आतम खबरि – आत्मज्ञान, तुर्क – मुसलमान, मर्म – रहस्य, काहू – किसी ने, मन्तर – गुप्त वाक्य बताना, बूड़े – डूबे, केतिक कहीं – कहाँ
तक कहूँ।
कबीरदास सज्जनों को संबोधित करते हुए कहते हैं कि देखो, यह दुनिया पागल हो गई है। सच बोलने वाले को यह मारने के लिए दौड़ता है और झूठ बोलने वाले की बात मानी जाती है।
कबीर कहते हैं कि उन्होंने कई लोगों को देखा है जो नियमों और धार्मिक आचरण का पालन करते हुए प्रात:काल स्नान करते हैं, अपने भीतर स्थित ईश्वर के आत्मतत्व को छोड़कर वे पत्थरों को पूजते हैं। वास्तव में उनमें कोई ज्ञान नहीं है, उनका ज्ञान सिर्फ दिखावा है।
उन्होंने कई धार्मिक गुरु, ऋषि और फ़क़ीरों को भी देखा है जो कई किताबें और कुरान पढ़ चुके हैं। वे अलग-अलग तरीकों से लोगों को अपने अनुयायियों बनाते हैं और अपने शिष्यों में भी वे अपने दिखावटी ज्ञान को भरने का प्रयास करते हैं। वे आसन लगाकर ध्यान करने के लिए बैठते हैं और दिखावा करते हैं। उनके मन में अहंकार भरा होता है। वे पीपल वृक्षों और पत्थरों की पूजा करते हैं।
कबीर कहते हैं कि बहुत से लोग तीर्थयात्रा के दिखावे में अपनी असली पहचान भूल गए हैं। वह कहते हैं कि जो लोग टोपी पहनते हैं, माला पकड़ते हैं, तिलक लगाते हैं और छापाधारी वस्त्र पहनते हैं, वास्तव में ईश्वर के वास्तविक स्वरूप को समझ नहीं पाते हैं। वे ईश्वर को ढूंढने के लिए भजन और श्लोक गाते रहते हैं, लेकिन माया की भ्रमांधी दुनिया में खो जाते हैं परंतु अपने भीतर स्थित आत्मत्व रूपी ईश्वरत्व की उन्हें कोई खबर नहीं रहती।
हिंदू धर्म का अनुयायी मानता है कि राम हमारे हैं तो मुसलमान धर्म को मानने वाले मानते हैं कि रहमान हमारे हैं। दोनों ही अपना धर्म सर्वोच्च मानने के लिए लड़ाई और संघर्ष करते हैं, लेकिन कोई नहीं जानता कि धर्म का वास्तविक सार क्या है।
कबीर मानते हैं कि वे लोग जो गुरु बनते हैं अभिमान से ग्रस्त होकर घर-घर मंत्रों को देते फिरते हैं, ऐसे गुरु और शिष्य सब माया में ही भ्रमित होकर डूब जाते हैं और अंततः माया में ही खो जाते हैं और अंत में इसका पछतावा करते हैं।