Summary for जामुन का पेड़ Class 11 Hindi Aroh
CBSE NCERT Revision Notes1
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“जामुन का पेड़” कृष्ण चंदर द्वारा लिखी गई एक हास्य व्यंग्य है। इस पाठ में, लेखक सरकारी व्यवस्था के अधिकारियों का वर्णन करते हुए बताते हैं कि वे भी अपने दिखावे के लिए सबसे छोटे काम को भी विशेष बनाते हैं और अपने काम को दूसरों को सौंपते हैं। वे अपने काम को नहीं करते हैं, बल्कि बहाने बनाते रहते हैं, भले किसी की जान चली जाए। इस तरह से, लेखक ने सरकारी व्यवस्था की बेदर्द और अमानवीय स्वभाव का भी वर्णन किया है।
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कृश्नचंदर का जन्म सन 1914 ई० में ज़िला गुजरांकलां के गाँव वजीराबाद में हुआ था। इनकी प्रारंभिक शिक्षा पुंछ में और उच्च शिक्षा लाहौर में हुई थी। सन 1934 ई० में इन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से एम० ए० (अंग्रेज़ी) की उपाधि प्राप्त की थी। इनका अधिकांश समय मुंबई में व्यतीत हुआ, जहाँ वे फ़िल्म जगत से जुड़े रहे। इनका प्रगतिशील लेखक संघ से गहरा संबंध था। 8 मार्च, 1977 ई० को मुंबई में इनका निधन हो गया था।
प्रमुख रचनाएँ: एक गिरजा-ए-खंदक, यूकेलिप्ट्स की डाली (कहानी-संग्रह); शिकस्त, जरगाँव की रानी, सड़क वापस जाती है, आसमान रौशन है, एक गधे की आत्मकथा, अन्नदाता, हम वहशी हैं, जब खेत जागे, बावन पत्ते, एक वायलिन समंदर के किनारे, कागज़ की नाव, मेरी یادों के किनारे (उपन्यास)।
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रात के दौरान तूफ़ान आया था और सचिवालय के पार्क में एक जामुन के पेड़ को उखाड़ दिया था। अगली सुबह, माली ने पार्क में गिरे हुए पेड़ के नीचे फंसे एक आदमी को देखा। यह देखकर माली ने चपरासी से कहा, चपरासी ने क्लर्क से और क्लर्क ने सुपरिंटेंडेंट से कहा। कुछ ही मिनटों में, फंसे हुए आदमी के चारों तरफ एक भीड़ इकट्ठी हो गई।
वे अधिकारियों के आने का इंतज़ार कर रहे थे। लोग जामुन के पेड़ गिरने के लिए दुख व्यक्त करने लगे क्योंकि इसके जामुन बहुत स्वादिष्ट थे और वे अपने बच्चों के लिए उन्हें लाते थे। माली ने उस आदमी से पूछा कि क्या वह अभी भी जिंदा है। जब उसने जवाब दिया तो सभी को राहत मिली। माली ने पेड़ को हटाने की सलाह दी, लेकिन सुपरिंटेंडेंट ने कार्रवाई करने से पहले उच्च अधिकारियों से परामर्श करने का फैसला किया। उसने
अंडर सेक्रेटरी को सूचना दी, और यह फाइल घुमते-घुमते मंत्री तक गई। इस में आधा दिन निकल गया।
फाइलें घूमती रहीं— कृषि विभाग ने जिम्मेदारी वाणिज्य विभाग पर डाली, और वाणिज्य ने फिर कृषि को लौटा दी। फिर हार्टीकल्चर ने कहा कि सरकार ने पेड़ लगाने का आदेश दिया था, काटने का नहीं। इस बीच आदमी वहीं पड़ा रहा।
कोई सोचने लगा कि आदमी को ही काट दिया जाए फिर जोड़ देंगे प्लास्टिक सर्जरी से। मेडिकल रिपोर्ट आई– "ऑपरेशन सफल हो सकता है लेकिन आदमी मर जाएगा," अतः प्रस्ताव अस्वीकार।
धीरे-धीरे यह मामला ‘कवि’ होने तक पहुँच गया। पता चला कि पेड़ तले दबा व्यक्ति कवि है। अब फाइल संस्कृति विभाग फिर साहित्य अकादमी तक गई। कवि की सदस्यता सुनिश्चित हुई, पर रिहाई टली रही।
फॉरेस्ट डिपार्टमेंट पहुँचा— मगर वहाँ से जवाब आया कि यह पेड़ विदेश से उपहार था। काटना मित्रता खराब करेगा। इसलिए आदमी की जान गंवाना उचित समझा गया।
सुबह आख़िरकार अनुमति मिल गई, पर तब तक कवि दम तोड़ चुका था। उसकी "फाइल" बंद हो चुकी थी।
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• झक्कड़ – तेज़ आँधी• बंदोबस्त – प्रबंध
• दरख्वास्त – प्रार्थना-पत्र
• डिप्टी सेक्रेटरी – उप सचिव
• चीफ़ सेक्रेटरी – मुख्य सचिव
• ज्वाइंट सेक्रेटरी – संयुक्त सचिव
• कल्चरल – सांस्कृतिक
• वज़ीफा – छात्रवृत्ति
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कवयित्री मनुष्यों से आग्रह करती हैं कि—
आओ, मिलकर हम प्रकृति के लगातार बढ़ते विनाश से बस्तियों को बचाएँ। शहरों में कारखानों और इमारतों के निर्माण से वन-संपदा का विनाश हो रहा है। यदि यह शहर की हवा बस्तियों तक पहुँच गई तो उनका अस्तित्व ही मिट जाएगा।
हमें अपनी संथाली संस्कृति को बचाना है। पूरी बस्ती को अशिक्षा और कुरीतियों के नशे से बाहर रखना है। हमारे चेहरे पर संथाल परगने की मिट्टी का रंग झलकना चाहिए। हमारी भाषा में झारखंडी बोली की सादगी बरकरार रहनी चाहिए, न कि बनावटीपन।
कवयित्री कहती हैं कि आज प्रकृति पर निर्भर आदिवासियों की दिनचर्या ख़त्म हो रही है। उनके जीवन का उत्साह और सरलता समाप्त होती जा रही है। भोलेपन और अक्खड़पन जैसी भावनाओं को हमें बचाना चाहिए।
उनकी संघर्ष करने की प्रवृत्ति, परिश्रम करने की आदत, पारंपरिक हथियार जैसे धनुष-डोरी और तीरों की नुकीलापन, कुल्हाड़ी की धार को संरक्षित करना आवश्यक है। हमें जंगलों की ताज़ी हवा को प्रदूषण से, नदियों की पवित्रता को गंदगी से, पहाड़ों की शांति को शोर से बचाना है। मिट्टी की खुशबू और लुप्त होती फसलों की लहलहाहट को फिर से जीवित करना होगा।
आबादी और विकास के कारण घर छोटे होते जा रहे हैं।
कवयित्री आग्रह करती है कि हम ऐसा वातावरण बनाएँ जहाँ—
• नाचने के लिए खुला आँगन हो,
• गाने के लिए गीत,
• हँसने के लिए खिलखिलाहट,
• रोने के लिए थोड़ा-सा एकांत,
• बच्चों के लिए खेल का मैदान,
• पशुओं के लिए हरी-हरी घास,
• बुज़ुर्गों के लिए प्राकृतिक शांति उपलब्ध हो।
आज का समय अविश्वास से भरा हुआ है। लोग एक-दूसरे पर भरोसा नहीं करते। ऐसे माहौल में हमें—
• थोड़ा-सा विश्वास,
• थोड़ी-सी उम्मीद,
• थोड़े-से सपने भी बचाकर रखने चाहिए।
कवयित्री कहती है कि आज भी हमारे पास बचाने के लिए बहुत कुछ शेष है। अगर हम कोशिश करें तो विस्थापन, प्राकृतिक विनाश और आदिवासी जीवन की कठिनाइयों को कम किया जा सकता है।