Summary for गलता लोहा Class 11 Hindi Aroh
CBSE NCERT Revision Notes1
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“गलता लोहा” कहानी में समाज के विभाजन पर टिप्पणियाँ की गई हैं। इस कहानी में, लेखक मेहनती लोगों के सच्चे भाईचारे को दिखाते हुए जाति के आधार पर बनी झूठी भाईचारे को पर्दाफाश करते हैं। यह एक प्रतिभाशाली लेकिन गरीब ब्राह्मण युवक मोहन के बारे में है, जो अपनी गंभीर परिस्थितियों से गुजरता हुआ एक मनोवृत्ति तक पहुँच जाता है जहाँ उसे जाति का अभिमान बेईमानी लगती है। सामाजिक नियमों और प्रतिबंधों के बावजूद, वह धनराम लोहार के ऑफ़र केवल वह उसके साथ बैठता नहीं है बल्कि अपनी कला का प्रदर्शन भी करता है।2
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प्रमुख कहानीकार शेखर जोशी का जन्म सन 1932 में अल्मोड़ा (उत्तराखंड) में हुआ। बीसवीं शताब्दी के छठे दशक में हिंदी साहित्य-जगत में एक साथ कई युवा कहानीकारों ने अलग रंग-ढंग की कहानियाँ लिखीं। शेखर जोशी की कहानियाँ भी नई कहानी आंदोलन के प्रगतिशील पक्ष का प्रतिनिधित्व करती हैं। इनकी कहानियों का आधार समाज का मेहनतकश और सुविधाहीन वर्ग है। इनकी मृत्यु सन् 2022 में हुई। प्रमुख रचनाएँ: कोसी का घटवार, साथ के लोग, दाज्यू, हलवाहा, नौरंगी बीमार है (कहानी-संग्रह); एक पेड़ की याद (शब्दचित्र-संग्रह)।3
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मोहन एक गरीब पुरोहित वंशीधर का बेटा है। पुरोहित अपनी पुरोहिताई से अपने परिवार को संभालने में असमर्थ थे। उन्हें मोहन से बहुत उम्मीद थी। बचपन से ही मोहन एक तेज-दिमाग बच्चा था। स्कूल के अध्यापक त्रिलोक सिंह कहते थे कि मोहन एक दिन बड़ा आदमी बनेगा और स्कूल को ख्याति दिलवाएगा। प्राथमिक स्तर की परीक्षा पास करने के बाद मोहन को एक छात्रवृत्ति मिली जिससे उसे एक उत्कृष्ट छात्र घोषित किया गया। वंशीधर का मन मोहन को एक शिक्षित और सफल आदमी बनाने की लालसा से भरा था।
उसने उसे और शिक्षा देने के लिए प्रयास शुरू किए। उच्च शिक्षा के लिए स्कूल गांव से चार मील दूर था। दो मील की चढ़ाई के अलावा, बरसात के मौसम में बहती नदी भी एक समस्या बन जाती थी। इन मुश्किलों को देखते हुए, मोहन के पिता ने उसे नदी के उस पार एक यजमान के साथ रहने का व्यवस्था करवाई, लेकिन बाढ़ के दौरान वंशीधर अपने बच्चे की सुरक्षा के लिए मोहन को घर ले आए। उसके बाद, उन्हें अपने बेटे के भविष्य की चिंता लगातार रहने लगी।
अपनी छुट्टियों के दौरान एक दिन, पुरोहित बिरादरी का युवक रमेश गांव आया था। वह लखनऊ में काम करता था। मोहन के पिता ने उनसे मोहन की आगे की पढ़ाई की चिंता व्यक्त की। रमेश ने वंशीधर को प्रोत्साहन देने के साथ-साथ मोहन को भी उसके साथ लखनऊ भेजने का सुझाव दिया। उसने उन्हें विश्वास दिलाया कि वह मोहन की अच्छी तरह सेवा करेगा और उसे ठीक से शिक्षित करेगा। वंशीधर इस प्रस्ताव से सहमत हुए और मोहन को रमेश के साथ लखनऊ भेज दिया।
जब मोहन लखनऊ पहुँचा, तब उसके जीवन के एक नए अध्याय की शुरुआत हुई। घर की महिलाएँ पूरे दिन उसे घरेलू कामों में व्यस्त रखती थीं। रमेश ने उसे घर में नौकर के समान रखा और उसका दाखिला साधारण से स्कूल में करा दिया। घरेलू कामों में पूरा दिन काम करने से मोहन थक जाता था और उसे ठीक से अध्ययन नहीं करने दिया जाता था। इस प्रकार गांव का उत्कृष्ट छात्र मोहन एक सामान्य लड़का बन गया।
उसका गांव से जुड़ाव लगभग पूरी तरह से टूट गया था। उन्होंने अपनी वास्तविक स्थिति के बारे में अपने माता-पिता तक से नहीं बताया क्योंकि वह सब बता कर उन्हें दुःख नहीं देना चाहता था। मोहन को अपनी आठवीं कक्षा पूरी करने के बाद छुट्टियों में गांव आना था। लखनऊ वापस लौटने के बाद, उसे अनुभव हुआ कि रमेश और उसके परिवार के सदस्य उसे आगे बढ़ाना नहीं चाहते थे। उनका मानना था कि बहुत से बी० ए०, एम० ए० भी बेरोज़गार फिरते-रहते हैं। अतः मोहन को हाथ का कोई काम सीखना चाहिए। रमेश ने मोहन को एक तकनीकी स्कूल में दाखिला करवाया। हालांकि, उसकी दिनचर्या अपरिवर्तित रही।
वह पूरा दिन घर के काम करते हुए बिता देता था और पढ़ाई के लिए उसे अवसर ही नहीं मिलता था। धीरे-धीरे, समय बीतता गया और मोहन खुद के पैरों पर खड़े होने के लिए कारखानों और उद्योगों में काम ढूंढने लगा। इस प्रकार गाँव के मेधावी मोहन का भविष्य शहर में आकर चौपट हो गया। जब मोहन के पिता को सच्चाई पता चली, तब उन्हें बहुत दुख हुआ।
समय बीतने के साथ-साथ मोहन अपने गांव वापस रहने के लिए लौट आया। एक दिन मोहन अपने खेत के किनारे की काँटेदार झाड़ियों की काँट-छाँट करने के उद्देश्य से घर निकला। उसने देखा कि उसके हँसुवे की धार कुंद पड़ गई। उसकी धार तेज़ करवाने के लिए वह अपने बचपन के सहपाठी धनराम लुहार के ऑफ़र पर गया। दोनों अपने बचपन की यादों में खो गए। मोहन ने मास्टर त्रिलोक सिंह के बारे में पूछा। धनराम ने बताया कि पिछले साल ही उनकी मृत्यु हो गयी। वे हंसने लगे और
बातें करने लगे। मोहन अध्ययन और गायन में माहिर था। वह मास्टर का पसंदीदा छात्र था और पूरे स्कूल का मॉनिटर नियुक्त किया गया था। मास्टर ने उसे कमजोर बच्चों को सजा देने की अधिकार भी दिया था। धनराम ने भी मोहन से मास्टर के आदेश पर डंडे खाए थे। धनराम उसके प्रति स्नेह व आदरभाव रखता था, क्योंकि जातिगत आधार की हीनता उसके मन में बैठा दी गई थी। उसने मोहन को कभी अपना प्रतिद्वंद्वी नहीं समझा।
धनराम केवल गांव के किसानों या मजदूरों के लड़कों की तरह तीसरी कक्षा तक की पढ़ाई कर सका। धनराम को तेरह का पहाड़ा कभी याद नहीं हुआ। इस कारण वह अक्सर मार खाता था। मास्टर जी का नियम था कि सजा पाने वाले को अपने लिए हथियार भी जुटाना होता था। धनराम डर या मंदबुद्ध होने के कारण तेरह का पहाड़ा नहीं सुना पाया। मास्टर जी ने व्यंग्य किया—‘तेरे दिमाग में तो लोहा भरा है रे। विद्या का ताप कहाँ लगेगा इसमें?’ इतना कहकर उन्होंने थैले से पाँच-छह दरॉतियाँ निकालकर धनराम को धार लगा लाने के लिए पकड़ा दी।
हालांकि, धनराम के पिता ने उसे हथौड़े से लेकर घन चलाने की विद्या सिखा दी। विद्या सीखने के दौरान मास्टर त्रिलोक सिंह उसे अपनी पसंद का बेंत चुनने की छूट देते थे, परंतु गंगाराम इसका चुनाव स्वयं करते थे और छड़ या बेंत से पीटते। एक दिन, गंगाराम की मृत्यु हो गयी। धनराम ने सहज भाव से अपने पिता की विरासत सँभाल ली।
धनराम गाँव की शिल्पकार जाति से संबंध रखता था और मोहन पुरोहित जाति का था। ब्राह्मण लोगों का शिल्पकार जाति के लोगों से मिलना-जुलना उचित नहीं माना जाता था। इस सब को जानते हुए भी, मोहन रूचि के कारण कुछ समय तक धनराम के साथ बैठे रहे।
मोहन के हँसुवे की धार तेज़ करने के बाद धनराम लोहे की एक मोटी छड़ को गोलाई में मोड़ने लगा, किंतु सफल नहीं हो पा रहा था। तभी अचानक मोहन अपनी जगह से उठा। उसने लोहे की छड़ को पकड़कर स्थिर किया और धनराम के हाथ से हथौड़ा लेकर नपी-तुली चोट लोहे पर की। उसके बाद उसने अपने हाथों से धौंकनी फूँककर लोहे को दुबारा भट्ठी में गर्म करके निहाई पर रखकर ठोक- पीटकर लोहे को सुघड़ गोले का रूप दे दिया।
यह सब इतनी तेज़ी से हुआ था कि धनराम हैरान होकर खड़ा रहा। वह पुरोहित खानदान के युवक द्वारा लोहार का काम करने पर आश्चर्यचकित था। दूसरी ओर मोहन संतुष्ट भाव से अपने लोहे के गोले की त्रुटिहीन गोलाई को जाँच रहा था। उसकी आँखों में एक सर्जक की चमक थी और वह जातीय भेदभाव से कोसों दूर था।
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निहाई – एक विशेष प्रकार का लोहे का ठोस टुकड़ा जिसपर लोहे आदि धातुओं को रखकर पीटा जाता है
रूद्रीपाठ – भगवान शंकर की आराधना के लिए किया गया पाठ
धौंकनी – लुहार की आग दहकानेवाली लोहे या बाँस की नली संटी पतली डंडी या छड़ी
घसियारे – घास काटने का काम करनेवाले
दारिद्रय – गरीबी
स्वप्नभंग – सपने का टूट जाना
अनुगूँज – रह-रहकर कानों में गूँजनेवाली आवाज़
बाबत – बारे में
हँसुवे – घास काटने का औज़ार
अनुत्तरित – बिना किसी उत्तर के
विद्याव्यसनी – पढ़ने में रुचि रखनेवाला
सर्जक – निर्माण करनेवाला