अक्क महादेवी

Summary for अक्क महादेवी Class 11 Hindi Aroh

CBSE NCERT Revision Notes

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पाठ परिचय 

Answer

अक्क महादेवी शैव आंदोलन से जुड़ी महत्वपूर्ण कवयित्री हैं। प्रथम वचन में कवयित्री ने इंद्रियों को वश में करने का संदेश दिया है। कवयित्री सारे संसार को समझा रही हैं कि यदि इंद्रियों को वश में किया जाए तो चन्नमल्लिकार्जुन शिव की प्राप्ति संभव है। उनका स्वर यहाँ उपदेशात्मक नहीं बल्कि आग्रह से भरा है।

दूसरे वचन में कवयित्री अपने आराध्य की अनुकंपा पाने के लिए कवयित्री किसी भी भौतिक वस्तु की प्राप्ति नहीं करना चाहती। वह कामना करती है कि ईश्वर ऐसी स्थितियाँ पैदा करे जिनमें उसका अहंकार पूर्ण रूप से नष्ट हो जाए। वह शिव की दया प्राप्ति के लिए सांसारिक उपभोगों के साथ-साथ अपना घर भी छोड़ने के लिए तैयार हैं।

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कवयित्री परिचय

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अक्क महादेवी का जन्म कर्नाटक के उडुतरी गाँव जिला शिवमोगा में 12वीं सदी में हुआ। अक्क महादेवी चन्नमल्लिकार्जुन देव की भक्त थीं। चन्नमल्लिकार्जुन वास्तव में शिव का ही नाम है। अक्क महादेवी ने चन्नमल्लिकार्जुन के प्रति अपनी भक्ति-भावनाओं, एकनिष्ठता, एकाग्रचित्तता का वर्णन अपने काव्य में किया है। इनके गुरु बसवन्ना थे। अक्क महादेवी ने पुरुष वर्चस्व के विरोध और आक्रोश के विरोध में अपने वस्त्रों को भी उतार दिया। अक्क ने शिव को अपना आराध्य माना। उन्हीं के कारण अनेक स्त्रियों ने शैव धर्म अपनाया। उनकी कविता भारतीय साहित्य में स्त्रीवादी आंदोलन की प्रेरणा स्रोत थी।

प्रमुख रचनाएँ: हिंदी में वचन सौरभ, अंग्रेज़ी में स्पीकिंग ऑफ़ शिवा (सं.- ए. के. रामानुजन)।

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हे भूख ! मत मचल
प्यास, तड़प मत 
हे नींद! मत सता
क्रोध, मचा मत उथल-पुथल
हे मोह! पाश अपने ढील
लोभ, मत ललचा
हे मद! मत कर मदहोश
ईर्ष्या, जला मत
ओ चराचर ! मत चूक अवसर
आई हूँ सदेश लेकर चन्नमल्लिकार्जुन का

Answer

शब्दार्थ: तड़प – छटपटाना, पाश – बंधन, मद – नशा, मदहोश – नशे में होश खो बैठना, चराचर – जड़ व चेतन, चूक – छोड़ना, चन्नमल्लिकार्जुन – शिव।

इन पंक्तियों में कवयित्री अक्क महादेवी इंद्रियों से आग्रह करती हैं। वे भूख से कहती हैं कि तू मचलकर मुझे मत सता। सांसारिक प्यास को कहती हैं कि तू मन में और पाने की इच्छा मत जगा। नींद से कहती हैं कि तू मानव को सताना छोड़ दे क्योंकि नींद से ही आलस्य की उत्पत्ति होती है और मानव ईश्वर प्राप्ति का मार्ग भूल जाता है।

क्रोध को मानव के हृदय में उथल-पुथल मचाना छोड़ने को बोलती हैं क्योंकि क्रोध में आकर मानव स्वयं ही विनाश के रास्ते बढ़ जाता है। मोह से आग्रह करती हैं कि मनुष्य को फँसाने के लिए बनाए गए बंधनों को ढीला कर दें। मोह में फँसकर ही मानव दूसरे मानव का अहित करने में भी संकोच नहीं करता।

हे लोभ! तू मानव को ललचाना छोड़ दे। लालच मनुष्य को संतुष्टि से बहुत दूर ले जाता है। हे अहंकार! तू मनुष्य को अधिक पागल न बना। हे ईर्ष्या! तू मनुष्य को जलाना छोड़ दे क्योंकि तेरे कारण मनुष्य न केवल दूसरों की तरक्की देख कर जलता है बल्कि वह तो स्वयं अपने-आप को भी जलाता है।

वे सृष्टि के जड़-चेतन जगत् को संबोधित करते हुए कहती हैं कि तुम्हारे पास शिव-भक्ति का जो अवसर है, उससे चूकना मत, क्योंकि मैं शिव का संदेश लेकर तुम्हारे पास आई हैं। कवयित्री यहाँ संदेश देना चाहती है कि इंद्रियों को जीतकर ही मानव चन्न मल्लिकार्जुन की शरण प्राप्त कर सकता है।

4

हे मेरे जूही के फूल जैसे ईश्वर
मँगवाओ मुझसे भीख
और कुछ ऐसा करो
कि भूल जाऊँ अपना घर पूरी तरह
झोली फैलाऊँ और न मिले भीख
कोई हाथ बढ़ाए कुछ देने को
तो वह गिर जाए नीचे
और यदि में झूकूं उसे उठाने
तो कोई कुत्ता आ जाए
और उसे झपटकर छीन ले मुझसे।

Answer

शब्दार्थ: जूही – एक सुगन्धित फूल, झपटकर – खींचकर।

कवयित्री ईश्वर से प्रार्थना करती है कि हे जूही के फूल को समान कोमल व परोपकारी ईश्वर! आप ऐसी परिस्थितियाँ पैदा करो कि जिनमें मेरे पास भौतिक सुख-साधन न बचें। मुझे भीख माँगनी पड़ जाए। मेरे पास कोई साधन न रहे।

कवयित्री को पता है कि जब सुख-साधन नहीं रहेंगे तो मोह और अहंकार का स्वयं ही नाश हो जाएगा और ईश्वर-प्राप्ति में बाधा नहीं आएगी। कवयित्री अपने ईश्वर को जूही के फूल के समान मानती हैं उनके अनुसार जिस प्रकार जूही का फूल अपनी खुशबू से लोगों को आनंद देता है उसी प्रकार ईश्वर लोगों का कल्याण करता है।

कवयित्री ईश्वर से आग्रह करती हैं – हे ईश्वर! कुछ इस प्रकार की परिस्थितियाँ बनाओ कि मैं अपने घर को पूरी तरह भूल जाऊँ। वह आगे कहती हैं कि जब वह भीख माँगने के लिए झोली फैलाए तो उसे कोई भीख नहीं दे। यदि कोई उसे कुछ देने के लिए हाथ बढ़ाए तो वह नीचे गिर जाए।

कवयित्री ईश्वर से प्रार्थना करती है कि यदि लोभवश वे नीचे गिरे पदार्थ को उठाने के लिए नीचे झुक भी जाएँ तो भगवान करे कि कोई कुत्ता वहाँ आकर उस पदार्थ को छीनकर उससे ले जाए। वे ईश्वर को पाने के लिए लोभ, मोह, अहंकार को त्याग देना चाहती हैं। यहाँ कवयित्री के समर्पण भाव की पराकाष्ठा दिखाई देती है। वह मान-अपमान से आगे निकलकर ईश्वर में खो जाना चाहती हैं।